(बदनाम खबरची) नागरिकता संशोधन बिल पर देश में उबाल।
नागरिकता संशोधन बिल पर देश में उबाल।

             सरकार खामोश क्यों।

 

बहुमत संख्या के आधार पर सरकार ने नागरिकता संशोधन बिल पास करा लिया, लेकिन देश की जनता को विश्वास में नहीं लिया, फलस्वरूप पूरे देश में धरना प्रदर्शन का होना चरम पर है, विरोध प्रदर्शनों की आग पूर्वोत्तर राज्यों से होती हुई देश की राजधानी समेत उत्तर प्रदेश के कई जनपदों में पहुंच गई है। इतने बबाल और गुस्से के बाद भी सरकार की चुप्पी या हटधर्मिता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं लग रही, भाजपा की एक लम्बे समय तक सहयोगी रही पार्टी शिवसेना व सरकार में शामिल जदयू समेत तमाम विपक्षी दलों ने नागरिकता संशोधन बिल पर अपना विरोध दर्शाया है।

ऐसे समय में जब देश जनसंख्या विस्फोट से जूझ रहा है,किसी अन्य देशों के नागरिकों को नागरिकता देने के लिए देश को आपात स्थिति में झोंक देना सरकार की मंशा पर प्रश्रचिन्ह खड़ा कर रहा है,पूर्वोत्तर राज्यों के निवासी जहां इस बिल के आने से अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस कर रहे है, वही दूसरी ओर देश का अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज इसको असमानता की दृष्टि से देख रहा है।अब सवाल उठता है कि आख़िर इस क़ानून में क्या है, जिसे लेकर विवाद इतना बढ़ गया है. इस क़ानून के मुताबिक़ पड़ोसी देशों से शरण के लिए भारत आए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है,इस नागरिकता में मुसलमानों को दूर रखा गया है, हालांकि क़ानून बनने से पहले इस बिल को लेकर विपक्ष बेहद कड़ा रुख़ अख़्तियार किया था और इसे संविधान की भावना के विपरीत बताया था।

पूर्वोत्तर के राज्य इसका विरोध कर रहे हैं, दरअसल, पूर्वोत्तर के कई राज्यों का कहना है, कि अभी भी बड़ी संख्या में उनके राज्य या इलाके में इस समुदाय के लोग ठहरे हुए हैं, अगर अब उन्हें नागरिकता मिलती है तो वह स्थाई हो जाएंगे,पूर्वोत्तर के संगठनों/छात्र संगठनों का कहना है कि अगर अधिकतर बाहरियों को वहां की नागरिकता मिलती है, तो स्थानीय अस्मिता, भाषा, कल्चर, लोगों पर इसका बुरा असर होगा,इसका ज्यादा विरोध असम में किया जा रहा है,

देश के अधिकतर क्षेत्र में इस कानून का विरोध इसलिए भी हो रहा है क्योंकि इस कानून को संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन बताया जा रहा है, आंदोलन कर रहे संगठनों का तर्क है कि यह बिल संविधान के आर्टिकल 14 के समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है, यही एक विरोध का असल कारण है, इसके साथ ही तर्क ये भी है कि यह कानून भारत के मूल विचारों यानी गंगा-जमुनी तहजीब का उल्लंघन करता है,

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार देश को धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश कर रही है,और अपने वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजधानी में हुए हिंसक प्रदर्शन पर दिल्ली की राजनीति गरमा गई है, जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी में दिल्ली पुलिस द्वारा परिसर के अंदर घुस कर जिस तरह गुंडई की गई है, उसकी चौतरफा निंदा तो हो ही रही है, साथ ही देश की अनेकों यूनिवर्सिटीज के छात्रों ने जामिया के छात्रों के समर्थन में जगह जगह धरना प्रदर्शन किया है, दिल्ली में हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद भाजपा बनाम आम आदमी पार्टी की जंग छिड़ गई है, दिल्ली में अगले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं, ऐसे में इन हिंसक प्रदर्शनों का असर चुनावों पर भी सकता है।