सीरत एजुकेशन सोसायटी के सरपरस्त हाजी कमाल सैफ़ी से एक मुलाकात।

 

मुस्लिमों में जगाती तालीम की अलख।

 

दिल्ली, यू तो सैफ़ी समाज की सैकड़ों तंजीमें समाज की तरक्की और शिक्षा के लिए काम करने का दावा करती नजर आती है, लेकिन उनका दावा अखबारी नज़र आता है, वह भी 6 अप्रैल "सैफ़ी डे" तक सिमट कर रह जाता है, ज्यादातर तंजीमों के सदर,जरनल सेक्रेटरी काम कम अपनी पब्लिसिटी ज्यादा करते देखे जा सकते है, यह एक तल्ख़ सच्चाई है, विरादराने सैफ़ी के बड़े बड़े नेता,पत्रकार,अफ़सर,उधोगपति आदि सैफ़ी बिरादरी के नाम पर अपनी दुकानदारी चमकाते देखे जा सकते हैं।

इस मफादपरस्त माहौल में एक ऐसी संस्था जो बिना किसी शोर शराबे के मुस्लिम शिक्षा के लिए काम कर रही है, उसका नाम है सीरत एजुकेशन सोसायटी, इस सोसायटी के सरपरस्त फरीदाबाद निवासी हाजी कमाल सैफ़ी जो कि हरियाणा के एक जाने माने बिल्डर है,से जब हमने सीरत एजुकेशन सोसायटी के बारे में बात की तो वह खुल कर बोले,हाजी कमाल सैफ़ी ने बताया कि हमारी कोशिश मुस्लिम समाज को तालीम की अहमियत बता कर तालीम से जोड़ने की है, यदि हम तालीमयाफ्ता हो गए तो मुस्लिमों में फैली बुराइयां काफ़ी हद तक खुद ही खत्म हो जाएंगी,हाजी कमाल ने बताया कि उनका मिशन दहेज प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकना भी है, हदीस में साफ लिखा है कि निक़ाह को इतना आसान बना दो कि जिनाह खत्म हो जाए, जबकि आज मुस्लिमों में लड़की होना अभिशाप बनता जा रहा है, जहीन और तालीमयाफ्ता लड़कियों के माँ बाप उसके दहेज को लेकर परेशान होते देखें जाते है,कमाल सैफ़ी बेवाक कहते है कि वह सैफ़ी बिरादरी से दहेज प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, अभी सीरत एजुकेशन सोसायटी के बैनर तले गरीब बेटियों की शादी कराने में लगें है,आने वाले समय में बिना दहेज शादी करने वाले जोड़ो का इस्तकबाल किया जाएगा, उनकी हौसला अफजाई से क़ौम के युवाओं में बिना दहेज शादियों का जज़्बा पैदा होगा, उनकी सस्था दहेज लोभियों का सामाजिक बहिष्कार भी करेंगी, इसके साथ तालीम को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाया जाता है, कोई भी ऐसा बच्चा जो पैसे के अभाव में अपनी पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हो बेहिचक हमारी संस्था से राफ्ता कायम कर सकता है इन्शा अल्लाह उस की पढाई नहीं रुकने दी जायेगी,हाजी कमाल सैफ़ी कहते है कि दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में मास्टर अली शेर सैफ़ी और उनकी टीम का तालीम के लिए किये जा रहे काम की जितनी तारीफ की जाए कम है, यदि मास्टर जी जैसी सोच के दो प्रतिशत लोग भी इस काम में जुट जाये, तो क़ौम का भला होते देर नहीं लगेगी।